खंड 49 No. 2 (2026): प्राथमिक शिक्षक
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प्राथमिक विद्यालयों के अध्यापकों के लिए बहुसांस्कृतिक शिक्षा की उपादेयता

सुमित गंगवार
सहायक आचार्य, शिक्षाशास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ, उत्तर प्रदेश – 226007
सरिता चौधरी
सहायक आचार्या, शिक्षा मनोविज्ञान एवं शिक्षा आधार विभाग, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, नई दिल्ली – 110016
मोहिता वर्मा
पीएच.डी. शोधार्थी, शिक्षाशास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ, उत्तर प्रदेश – 226007

प्रकाशित 2026-07-13

सार

संस्कृति एक समाज या समुदाय की जीवनशैली, परंपराएँ, विश्वास, कला, भाषा, रीति-रिवाज और नैतिक मूल्यों का समुच्चय होती है, जो समय के साथ विकसित होती रहती है। इसे हम समाज के सदस्य के रूप में उत्तराधिकार स्वरूप प्राप्त करके अपनी अगली पीढ़ी को स्थानांतरित कर देते हैं।

प्राथमिक स्तर पर शिक्षा के माध्यम से संस्कृति का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानांतरण आसानी से किया जा सकता है। अतः विद्यालय में सांस्कृतिक भागीदारी को सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

वर्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य में सांस्कृतिक विविधता बढ़ने के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी विविध पृष्ठभूमियों से आने वाले विद्यार्थियों की संख्या में वृद्धि हुई है। अतः ऐसी परिस्थिति में प्राथमिक विद्यालयों के अध्यापकों के लिए विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों से आने वाले विद्यार्थियों की संस्कृति का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक हो जाता है, जिसे बहुसांस्कृतिक शिक्षा के माध्यम से संभव बनाया जा सकता है।

इस शोध-लेख के अध्ययन उपरांत प्राथमिक स्तर के अध्यापक बहुसांस्कृतिक शिक्षा की संकल्पना, ऐतिहासिक विकास, घटक तथा विद्यालयी अधिगम पारिस्थितिकी में इसकी उपादेयता से परिचित होकर कक्षागत शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को सांस्कृतिक रूप से और अधिक समावेशी बना सकेंगे।

इसके माध्यम से वे विद्यार्थियों को विविध संस्कृतियों के प्रति सकारात्मक योगदान देने संबंधी ज्ञान, क्षमता, मूल्य और स्वभाव प्राप्त करने में सक्षम बना सकेंगे।