प्रकाशित 2026-07-13
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सार
प्रस्तुत लेख का उद्देश्य भाषा, शिक्षा और अस्मिता से संबंधित सैद्धांतिक दृष्टियों की विवेचना करना है। इस विवेचना को प्रस्तुत करते हुए लेख तीन समानांतर धाराओं की पहचान करता है।
प्रथम धारा उत्तर-औपनिवेशिक काल में भी विदेशी भाषा के प्रचलन का समर्थन करती है। द्वितीय धारा सांस्कृतिक अस्मिता और देशज ज्ञान-परंपरा को प्रासंगिक मानते हुए स्थानीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन की पक्षधर है। तृतीय धारा वैश्विक समाज के लिए भाषा के नए रूपों, जिनमें शब्दों और मुहावरों के संकरण को स्वीकार किया जाता है, पर बल देती है।
इन दृष्टिकोणों के निहितार्थों के आधार पर लेख में बहुभाषिकता, सांस्कृतिक अस्मिता तथा वैश्विक भाषा के विश्लेषणात्मक आयामों को रेखांकित किया गया है। तत्पश्चात् इन्हीं के आलोक में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा विद्यालयी शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2023 का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
लेख में यह प्रतिपादित किया गया है कि प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षण केवल अधिगम प्रक्रिया को सुगम और प्रभावी नहीं बनाता, बल्कि यह सांस्कृतिक अस्मिता, आत्मबोध तथा वैचारिक स्वराज की मजबूत आधारभूमि भी तैयार करता है।
मातृभाषा में शिक्षा बच्चों को अपनी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक परिवेश से जोड़ती है तथा उनके विचारों और अभिव्यक्ति को अधिक स्वाभाविक एवं सशक्त बनाती है। इस प्रकार भाषा, शिक्षा और अस्मिता के मध्य गहरे संबंध को समझते हुए बहुभाषिक एवं समावेशी शिक्षा व्यवस्था के निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया गया है।