प्रकाशित 2026-07-14
संकेत शब्द
- पंचतंत्र,
- विद्यालयी प्रशासन,
- शैक्षिक प्रबंधन,
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020,
- उद्देश्य आधारित प्रबंधन
- शैक्षिक नेतृत्व,
- रणनीतिक प्रबंधन,
- हितधारक सहभागिता,
- मूल्य आधारित शिक्षा,
- नीतिगत शिक्षण ...##plugins.themes.classic.more##
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सार
प्रबंधन सिद्धांत व व्यवहारों में हमारे भारतीय ऋषि-मुनियों एवं प्रबुद्ध विचारकों द्वारा रचित ग्रंथों एवं साहित्य में प्रबंधकीय शिक्षण-प्रशिक्षण के प्रतिमान किसी न किसी रूप में प्रस्फुटित होते रहे हैं, जैसे— ‘गीता’, ‘चाणक्य नीति’, ‘विदुर नीति’ और ‘शुक्रनीति’, जैन व अन्य प्रमुख भारतीय दर्शन, जैसे— ‘पंचतंत्र’, ‘हितोपदेश’ आदि। ‘पंचतंत्र’ की लोकप्रिय कथाएँ भारतीय संस्कृत साहित्य की अनमोल धरोहर हैं, जिसमें युक्तियुक्त जीवनयापन हेतु नीतिगत ज्ञान एवं कौशल निहित हैं, जो शिक्षण जगत से जुड़े विविध हितधारकों, विद्यालयी प्रशासक, शिक्षक, विद्यार्थी आदि को ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ के अनुसार ज्ञान, कौशल एवं मूल्यों के विकास हेतु प्रेरक वातावरण उपलब्ध करा सकती हैं। यह लेख शिक्षण व्यवस्था के प्रबंधन की दृष्टि से मुख्य रूप से ‘पंचतंत्र’ के तृतीय खंड काकोलूकीयम् में वर्णित नीति-कथाओं पर केंद्रित है, तथापि समग्रता की दृष्टि से प्रथम (मित्रभेद), द्वितीय (मित्रप्राप्ति) व चतुर्थ खंड (लब्धप्रणाश) का संदर्भ भी यथास्थान लिया गया है। इसके कथानकों व नीतिगत श्लोकों में गर्भित ज्ञान शिक्षण संस्थाओं का उद्देश्य-संचालन (मैनेजमेंट बाय ऑब्जेक्टिव) करने, साथियों की सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित करने, शिक्षा के योग्य वातावरण का निर्माण करने एवं हितधारकों के क्षमतावर्धन में पथ-प्रदर्शक की भूमिका अदा कर सकता है।