Published 2026-07-14
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Abstract
यह शोध-पत्र वाराणसी के निकट स्थित प्रतापपुर गाँव की प्राथमिक शिक्षा की अधिगम पारिस्थितिकी का वृत्त अध्ययन (केस स्टडी) प्रस्तुत करता है। इस शोध (वृत्त) अध्ययन का उद्देश्य पिछले 75 वर्षों में ग्रामीण भारत की विद्यालयी शिक्षा में हए बदलावों की जाँच कर उसकी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रासगिंकता को दर्शाना था। इसके लिए उक्त गाँव में हुए सामाजिक , राजनीतिक और आर्थिक बदलावों को संज्ञान में लेते हए तीन विशिष्ट कालावधियों (1960 से 1975, 1985 से 2000 तथा 2010 से 2023) की प्राथमिक विद्यालयी शिक्षा की प्रवत्तिृयों और प्रमुख प्रस्थानों का विश्लेषण किया गया। इस वृत्त अध्ययन से ज्ञात होता है कि स्वतत्रता के बाद के दशकों में ग्रामीण भारत में विद्यालयी शिक्षा के प्रति ललक थी। इसी कारण सामुदायिक प्रयास से गाँव के बच्चों की विद्यालयी शिक्षा हेतु प्रबंध किया जा रहा था। 1980 के दशक से राज्य के गहन प्रयास से विद्यालयी शिक्षा की दशा एवं दिशा बदली। इस दौर में अध्यापकों की नियुक्ति एव प्रंशिक्षण पर बल दिया गया था। इसी दौर में शिक्षा के प्रसार के लिए निजी विद्यालय भी पनपना शरू हुए थे। इक्कीसवीं शताब्दी के प्रथम दो दशकों में यद्यपि सरकारी विद्यालय संसाधन , शिक्षक और शिक्षणशास्त्र के आधार पर उन्नत हुए हैं, लेकिन ग्रामीण लोग अभी भी उन्हें ‘कम शुल्क लेने वाले’ निजी विद्यालयों की तुलना में कमतर मानते हैं। यह शोध अध्ययन यह भी बताता है कि ग्रामीण परिवेश में सामाजिक गतिशीलता के लिए शिक्षा की व्यापक स्वीकृति है, लेकिन शिक्षा द्वारा सामाजिक बदलाव के लक्ष्य पर हितरक्षक मौन हैं। इस ग्रामीण परिवेश में संसाधन, सम्पन्नता विद्यार्थियों की अकादमिक उपलब्धि और उच्च शिक्षा की गतिशीलता को पहचाना जा रहा है, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से होने वाले बहिष्करण को संज्ञान में नहीं लिया जा रहा है।