प्रकाशित 2026-07-13
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सार
यह लेख लोककथाओं की विकास-यात्रा का अध्ययन करता है, जिसमें उनकी मौखिक परंपरा से लेकर डिजिटल कहानी-कथन (Digital Storytelling) के आधुनिक रूपों तक के परिवर्तन को समझने का प्रयास किया गया है। यह लेख उन विभिन्न तरीकों की जाँच करता है, जिनके माध्यम से डिजिटल प्रौद्योगिकियों ने लोककथाओं को सुनाने, साझा करने और अनुभव करने की प्रक्रियाओं को परिवर्तित किया है। साथ ही, यह परिवर्तन समाज और संस्कृति पर किस प्रकार प्रभाव डाल रहा है, इसका भी विश्लेषण किया गया है।
लेख का मुख्य फोकस इस बात पर है कि परंपरा और नवाचार किस प्रकार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं तथा डिजिटल मंच (Platforms) समकालीन दर्शकों के लिए लोककथाओं को किस प्रकार संरक्षित, पुनर्परिभाषित और प्रस्तुत कर रहे हैं। डिजिटल माध्यमों ने लोककथाओं को व्यापक पहुँच प्रदान की है, जिससे वे भौगोलिक सीमाओं से परे वैश्विक दर्शकों तक पहुँच रही हैं।
इस लेख में मौखिक, लिखित और दृश्य माध्यमों में प्रस्तुत लोककथाओं के लाभों तथा चुनौतियों पर भी विचार किया गया है। विशेष रूप से कहानी-निर्माण के लोकतंत्रीकरण, सांस्कृतिक विनियोग (Cultural Appropriation), बौद्धिक संपदा अधिकारों से जुड़े जोखिमों तथा इनसे संबंधित नैतिक प्रश्नों की चर्चा की गई है। लेख यह भी रेखांकित करता है कि डिजिटल माध्यमों में लोककथाओं का प्रसार जितना अवसर प्रदान करता है, उतनी ही सावधानी सांस्कृतिक प्रामाणिकता और संरक्षण के संदर्भ में अपेक्षित होती है।
इसके अतिरिक्त, लेख यह स्पष्ट करता है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय ज्ञान-परंपरा, स्थानीय भाषाओं और डिजिटल शिक्षा को विशेष महत्व देती है। यह नीति पारंपरिक ज्ञान-संपदा और आधुनिक तकनीक के समन्वय को प्रोत्साहित करती है। इसी परिप्रेक्ष्य में लोककथाओं की मौखिक परंपरा से डिजिटल कथाओं तक की यात्रा को समझा जा सकता है।
लेख का निष्कर्ष यह है कि लोककथाएँ केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं हैं, बल्कि वे बदलते समय के साथ नए माध्यमों में स्वयं को रूपांतरित करने की क्षमता भी रखती हैं। डिजिटल प्रौद्योगिकी ने लोककथाओं के संरक्षण, प्रसार और पुनर्पाठ के नए अवसर प्रदान किए हैं, जिससे वे वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए प्रासंगिक बनी रह सकती हैं।