खंड 48 No. 4 (2024): प्राथमिक शिक्षक
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लोककथाओं में अंतर्निहित सामाजिक कौशल : एक शिक्षणशास्त्रीय विवेचना

ऋषभ कुमार मिश्र
सहायक आचार्य, शिक्षा संकाय, लोधी रोड परिसर, डॉ. बी.आर. अंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली, दिल्ली – 110006
शुभम कुमार पति
शोधार्थी, शिक्षा संकाय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली – 110007

प्रकाशित 2026-07-13

सार

यह लेख भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) द्वारा वित्तपोषित एक शोध परियोजना का भाग है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की अनुशंसाओं को ध्यान में रखते हुए इस लेख का मुख्य प्रतिपाद्य यह है कि भारत की आदिवासी लोककथाएँ बच्चों में सामाजिक-सांवेगिक कौशलों के विकास का एक प्रभावी शिक्षणशास्त्रीय माध्यम हो सकती हैं।

इस विचार की पुष्टि के लिए मास्टेन (2015) द्वारा प्रस्तुत रक्षात्मक कारकों (Protective Factors) तथा सामाजिक-सांवेगिक विकास की सैद्धांतिकी का उपयोग किया गया है। इसी सैद्धांतिक आधार पर प्रस्तुत शोध लेख में तीन आदिवासी समुदायों— बैगा, कोल तथा कुरुम्बा समुदायों की लोककथाओं का विषयवस्तु विश्लेषण किया गया है। इन समुदायों से क्रमशः ‘कहानियों की कहानी’, ‘बाप-बेटा’ तथा ‘गड़ा धन’ लोककथाओं का चयन किया गया।

विश्लेषण से यह ज्ञात होता है कि लोककथाएँ संस्कृति-स्पंदित सामग्री होती हैं, जिनमें समुदाय के परिवेश, जीवन-दृष्टि, मूल्य, अनुभव तथा सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों का प्रतिबिंब दिखाई देता है। इन कथाओं में परिवेश के रक्षात्मक (Protective) तथा जोखिमयुक्त (Risk) कारकों का भी चित्रण मिलता है। कथाओं के केंद्रीय पात्र अपने व्यक्तिगत गुणों, सामुदायिक सहयोग तथा उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए विभिन्न चुनौतियों का सामना करते हैं और उनका समाधान खोजते हैं।

लोककथाओं की यह विशेषता बच्चों को जीवन की वास्तविक परिस्थितियों, समस्याओं तथा उनके समाधान से परिचित कराती है। साथ ही, वे बच्चों में सहानुभूति, आत्मविश्वास, सहयोग, निर्णय-निर्माण, समस्या-समाधान तथा भावनात्मक संतुलन जैसे सामाजिक-सांवेगिक कौशलों के विकास में भी सहायक होती हैं।

इन्हीं विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए यह लेख लोककथाओं के शिक्षणशास्त्रीय आयामों पर प्रकाश डालता है। लेख यह सुझाव देता है कि यदि बच्चों को लोककथाओं के साथ सक्रिय रूप से जोड़ा जाए, तो उनकी सामाजिक-सांवेगिक दक्षताओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है। इस प्रकार आदिवासी लोककथाएँ केवल सांस्कृतिक धरोहर ही नहीं हैं, बल्कि वे बच्चों के समग्र विकास और मूल्यपरक शिक्षा के लिए भी एक प्रभावी शैक्षिक संसाधन सिद्ध हो सकती हैं।