खंड 48 No. 3 (2024): प्राथमिक शिक्षक
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हिंदी भाषा की पाठ्यपुस्तक ‘सारंगी 2’ : शिक्षकों के शिक्षण में चुनौतियाँ और सुझाव

अशोक कुमार
सहायक अध्यापक, शैक्षिक मनोविज्ञान एवं शिक्षा आधार विभाग, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (रा.शै.अ.प्र.प.), नई दिल्ली – 110016
रमेश कुमार
सह-आचार्य, प्राथमिक शिक्षा विभाग, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (रा.शै.अ.प्र.प.), नई दिल्ली – 110016

प्रकाशित 2026-07-13

सार

भाषा वह साधन है जिसके माध्यम से हम अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों को अभिव्यक्त करते हैं। इसके लिए हम वाचिक ध्वनियों तथा अन्य भाषायी प्रतीकों का उपयोग करते हैं। बच्चे अपने माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ संवाद करते हुए स्वाभाविक रूप से एक भाषा सीखते हैं, जिसे उनकी मातृभाषा या प्रथम भाषा कहा जाता है। मातृभाषा को बच्चे अपने प्रत्यक्ष अनुभवों तथा सहज सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश में सीखते हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कक्षा 5 तक तथा जहाँ संभव हो, कक्षा 8 और उससे आगे तक मातृभाषा, स्थानीय भाषा अथवा क्षेत्रीय भाषा को शिक्षण का माध्यम बनाए जाने की अनुशंसा की गई है। भाषा के महत्व को देखते हुए इसे विभिन्न प्रासंगिक विषयों तथा वास्तविक जीवन के अनुभवों से जोड़कर सिखाया जाना चाहिए।

मातृभाषा का जीवन और शिक्षा दोनों क्षेत्रों में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इसी के माध्यम से हम बोलते, लिखते, सोचते और ज्ञान अर्जित करते हैं। यह हमारे स्वप्नों, अनुभूतियों तथा भावनात्मक अभिव्यक्तियों की भाषा होती है। जन्म के बाद बच्चों के संज्ञानात्मक विकास के साथ-साथ उनकी मातृभाषा का भी विकास होता है। प्रारंभिक वर्षों में संज्ञानात्मक विकास और भाषा विकास साथ-साथ चलते हैं, किंतु शीघ्र ही भाषा बच्चों के आगे के बौद्धिक विकास का प्रमुख साधन बन जाती है। यह उनके चिंतन, बोध और ज्ञान-निर्माण का आधार भी बनती है।

अतः बुनियादी स्तर पर भाषा-शिक्षण को सरल, रुचिकर और अनुभवपरक रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इससे बच्चे अपनी जिज्ञासा, कल्पनाशीलता तथा सृजनात्मकता को भाषा के माध्यम से प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त कर सकते हैं।

प्रस्तुत आलेख में भाषा-शिक्षण के एक सशक्त साधन के रूप में ‘सारंगी’ पाठ्यपुस्तक को समझने तथा उसके अनुरूप कार्य करने के लिए अनेक संकेत दिए गए हैं। ये संकेत बच्चों के लिए उदाहरणस्वरूप हैं। बच्चे इन संकेतों को आधार बनाकर स्वयं चिंतन कर सकते हैं तथा नवीन विचारों और रचनाओं का सृजन कर सकते हैं।

यह आलेख भाषा-शिक्षण को केवल भाषायी कौशलों के विकास तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे मौलिक चिंतन, रचनात्मक अभिव्यक्ति और सृजनात्मक प्रवृत्तियों के विकास से भी जोड़ता है। इस प्रकार यह भाषा-शिक्षण को बच्चों के समग्र विकास का एक प्रभावी माध्यम बनाने की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है।