Vol. 48 No. 3 (2024): प्राथमिक शिक्षक
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असम के विद्यालयों में कला-शिक्षा की समस्याएँ

अपू बोनिया
सहायक आचार्य (अतिथि संकाय), शिक्षा विभाग, माधवदेव विश्वविद्यालय, नॉर्थ लखीमपुर, असम – 784164
विवेक सिंह
सहायक आचार्य, शिक्षा विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश – 211002

Published 2026-07-13

How to Cite

बोनिया अ., & सिंह व. (2026). असम के विद्यालयों में कला-शिक्षा की समस्याएँ. प्राथमिक शिक्षक, 48(3), p.102-109. https://ejournals.ncert.gov.in/index.php/pp/article/view/5500

Abstract

कला-शिक्षा मानव सभ्यता के साथ हजारों वर्षों से चली आ रही एक अमूल्य सांस्कृतिक विरासत है। प्रत्येक समुदाय और संस्कृति की अपनी विशिष्ट कलात्मक परंपराएँ होती हैं। कला-शिक्षा के अभाव में कोई भी समाज अपनी सामाजिक एवं सांस्कृतिक जड़ों से कट सकता है। यही कारण है कि विश्व के अधिकांश देशों ने कला-शिक्षा को अपनी शैक्षिक व्यवस्था का अभिन्न अंग बनाया है।

प्राथमिक विद्यालय कला-शिक्षा के विकास और संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थित असम राज्य अपनी समृद्ध एवं विविध कलात्मक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। प्रस्तुत शोधपत्र असम राज्य के विद्यालयों में कला-शिक्षा से संबंधित समस्याओं और चुनौतियों का अध्ययन प्रस्तुत करता है।

इस अध्ययन के अंतर्गत राज्य के दो जिलों के 149 प्रारंभिक विद्यालयों का सर्वेक्षण किया गया। शोध का केंद्रबिंदु कला-शिक्षा से संबंधित विभिन्न पहलुओं, जैसे— शिक्षण व्यवस्था, बुनियादी अवसंरचना, प्रशासनिक व्यवस्थाएँ तथा संसाधनों की उपलब्धता का विश्लेषण करना था।

अध्ययन के निष्कर्षों से ज्ञात हुआ कि विद्यालयों में कला-शिक्षा के प्रभावी क्रियान्वयन में अनेक बाधाएँ विद्यमान हैं। इनमें शिक्षकों में अपने कार्य के प्रति अपेक्षित प्रतिबद्धता और ईमानदारी का अभाव, शिक्षकों की अनियमित उपस्थिति, वित्तीय सहायता की कमी तथा अपर्याप्त आधारभूत संरचना प्रमुख समस्याएँ हैं।

शोध यह भी इंगित करता है कि कला-शिक्षा को विद्यालयी जीवन का प्रभावी भाग बनाने के लिए आवश्यक संसाधनों, प्रशिक्षण और प्रशासनिक सहयोग की आवश्यकता है। इसके लिए राज्य के विद्यालयों में कला-शिक्षा से संबंधित नवाचारों को लागू करना तथा शिक्षकों को कला-आधारित शिक्षण पद्धतियों के प्रति प्रशिक्षित करना आवश्यक है।

इस प्रकार, कला-शिक्षा न केवल विद्यार्थियों की सृजनात्मकता, सौंदर्यबोध और अभिव्यक्ति क्षमता का विकास करती है, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान को भी सुदृढ़ बनाती है। इसलिए विद्यालयी शिक्षा में कला-शिक्षा को प्रभावी ढंग से समाहित करना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।