Vol. 44 No. 4 (2024): भारतीय आधुनिक शिक्षा
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लोककथाओं में मानव और मानवेतर जीव संबंध : एक शिक्षणशास्त्रीय विवेचना

शुभम कुमार पति
शोधार्थी, शिक्षा संकाय, दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली।
ऋषभ कुमार मिश्र
असिस्टेंट प्रोफेसर, शिक्षा संकाय, लोधी रोड परिसर, डॉ. बी.आर. अंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली।

Published 2026-07-14

How to Cite

पति श. क., & मिश्र ऋ. क. (2026). लोककथाओं में मानव और मानवेतर जीव संबंध : एक शिक्षणशास्त्रीय विवेचना. भारतीय आधुनिक शिक्षा, 44(4), p.39-50. https://doi.org/10.64742/scq8yf60

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Abstract

इस शोधपत्र में लोककथाओं को शिक्षणशास्त्रीय सामग्री मानते हुए झारखण्ड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में रहने वाले मुण्डा, हो, धरवा और संथाल आदिवासी समुदायों की चयनित लोककथाओं एवं उनकी विषयवस्तु का विश्लेषण किया गया है। इस कार्य के लिए उत्तरमानवतावादी (पोस्ट ह्यूमनिज्म) सैद्धान्तिक परिप्रेक्ष्य का उपयोग किया गया है। यह परिप्रेक्ष्य मनुष्यों द्वारा मानवेतर जीवों और वस्तुओं को व्याख्यायित करने वाले मानव-सर्वोच्चतावादी दृष्टिकोण को चुनौती देते हुए उनकी स्वायत्त सत्ता को पुनर्परिभाषित करने की वकालत करता है।

उक्त सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि के आलोक में यह शोधपत्र लोककथाओं में मानव और मानवेतर जीवों के संबंधों का विश्लेषण करता है तथा शिक्षण के लिए इसके निहितार्थों पर प्रकाश डालता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में बच्चों को जीवनपर्यंत अधिगमकर्ता के रूप में परिकल्पित किया गया है। इस नीति में यह सैद्धान्तिक स्वीकृति है कि मनुष्य जीवनपर्यंत अपने व्यावहारिक अनुभवों, क्रियाकलापों और गतिविधियों से सीखता है। वह अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में स्थित मानवीय एवं गैर-मानवीय संसाधनों के साथ अंतःक्रिया के आधार पर ज्ञान का निर्माण करता है।

ज्ञान-निर्माण की इस प्रक्रिया में लोककथाओं जैसे सामाजिक-सांस्कृतिक साधन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में इन सांस्कृतिक संसाधनों को विद्यालयी अनुभवों के साथ एकीकृत करने की अनुशंसा की गई है। इसे ध्यान में रखते हुए शोधपत्र में लोककथाओं को विवेच्य सामग्री बनाते हुए उनके शिक्षणशास्त्रीय महत्व पर प्रकाश डाला गया है।