Published 2026-07-14
Keywords
- पारंपरिक गुरु,
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020,
- भारतीय ज्ञान परंपरा,
- ज्ञानार्थ प्रवेश, सेवार्थ प्रस्थान
How to Cite
Share
Abstract
भारतीय ज्ञान परंपरा अपने उद्गम से ही‘विज्ञानवान प्रज्ञानवानभवतु , के साथ ज्ञानार्थ प्रवेश, सेवार्थ प्रस्थान के शांतिपूर्ण सह- अस्तित्व समावेशी समाज की परस्पर सहयोगी और बन्धुत्वपूर्ण अवधारणा पर कार्य करती आई है। लेकिन ज्ञान की पश्चिमी अवधारणा और आधनिुकता ने इसे परी तरह प्रतिस्पर्धी बनाकर मानवीय समाज को बंधुत्व से परे प्रतिस्पर्धी में बदल दिया है। यह आने वाले समय में सामाजिक विद्वेष का कारण बनती जा रही है। यही कारण है कि वैश्विक स्तर पर पिछले कई दशकों से अध्यापन चिंता का विषय बना हुआ है। यूनेस्को की वर्ष 2021 में प्रकाशित रिपोर्ट (स्टेट ऑफ द एजुकेशन रिपोर्ट फॉर इंडिया 2021— नो टीचर, नो क्लास) ने भारत में लगभग एक करोड़ अध्यापकों की पेशेवर भमिूका और पहचान को स्कूली शिक्षा के विस्तार ने विविधतापरू्ण और चुनौती बताया है। ऐसे में भारतीय अध्यापकों से भारतीय ज्ञान परंपरा से संपन्न ‘पारंपरिक गुरु’ और इक्कीसवीं सदी के ‘आधनिुक शिक्षणशास्त्र के ज्ञान’ से संपन्न और समद्ध होने की उम्मीद की जाती है। इसी वजह से वर्तमान सदी न केवल विद्यार्थियों के लिए बल्कि अध्यापकों के लिए भी उतनी ही चनौतीपूर्ण है। इस दृष्टि से राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एक ऐसा अवसर प्रदान करती है जहाँ अध्यापक और विद्यार्थी दोनों ही ज्ञान की नूतन विषय-वस्तुओं संदर्भों और देशज ज्ञान परंपरा के साथ अतंर्क्रिया कर सकेंगे। ऑनलाइन शिक्षा की आभासी दुनिया, यांत्रिक अधिगम और मानव जनित कृत्रिम बद्धिु मत्ता की अवधारणा दोनों के लिए ही नवीन है। इसलिए शिक्षा नीति इस बात पर बल देती है कि अध्यापक को आवश्यक एवं समयानुकूल बेहतर शिक्षा एवं प्रशिक्षण प्रदान कर तैयार किया जाए है। वस्तुतः इस तरह की वैचारिक समझ ही विलक्षण एवं चितनशील आधुनिक यवुा पीढ़ी को अध्यापन-शैक्षिक क्षेत्र में कार्य करने के लिए प्रेरित कर सके गी। यह लेख उपर्युक्त इन्हीं बिंदओु को व्याख्यायित और विश्लेषित कर मार्गदर्शन प्रदान करता है।