प्रकाशित 2026-07-13
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सार
शिक्षा की वृहद संकल्पना उसे न तो स्कूल की चारदीवारी में बाँधती है और न ही औपचारिक परीक्षा के दायरे में बाँधती है। शिक्षा स्वयं में ‘मुक्ति’ का साधन भी है और साध्य भी!— ‘सा विद्या या विमुक्तये!’ अत: वह किसी भी ‘बंधन’ को न तो स्वीकार करती है और न ही बच्चों या शिक्षार्थियों को किसी भी बंधन में बाँधती है। यहाँ यह समझना होगा कि बंधन और अनुशासन में अंतर होता है, अनुशासन में भी एक प्रकार का लचीलापन और उन्मुक्तता होती है, लेकिन ऐसा मनमानापन नहीं होता जो किसी दूसरे को कष्ट पहुँचाए या फिर समस्त प्रकार की मर्यादाओं का उल्लंघन करे। नदी भी जब दो पाटों के बीच बहती है तो कल्याणकारी होती है, पाटों की मर्यादाओं का उल्लंघन करते ही वह विनाशकारी हो जाती है। यही स्थिति शिक्षा की भी है और शिक्षा-जीवन की भी! शिक्षा की वृहद संकल्पना उसे सृजन से भी जोड़ती है और यह सृजनता अनेक आयाम-मुखी है। सृजनता में अनिवार्य रूप से लोक कल्याणकारी प्रवृत्ति सम्मिलित होती है जो ‘स्व’ से प्रारंभ होकर ‘पर’ तक जाती है। इस ‘पर’ में परायापन का भाव निहित नहीं है, बल्कि सृजन का विस्तार शामिल है कि वह केवल व्यष्टि तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वह समष्टि के विस्तृत कैनवास पर अपनी छाप अंकित करती है।