प्रकाशित 2026-07-13
##submission.howToCite##
सार
शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के द्वारा बच्चों के व्यवहार में स्थायी परिवर्तन लाया जाता है। इस तरह प्राथमिक स्तर की शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने में शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है अर्थात वह किस विधि से कक्षा में बच्चों को अधिगम में सहायक होता है। उदाहरण के लिए, अध्यापक-केंद्रित, बाल-केंद्रित और करके सीखने की विधि से, यदि शिक्षक कक्षा में बच्चों को अध्यापक-केंद्रित विधि से पढ़ा रहा है तो वह किसी न किसी रूप में बच्चों को कक्षा में विषयवस्तु को रटवाने से ज्यादा कुछ भी नहीं करता है, जिसका परिणाम बच्चे बार-बार विषयवस्तु को भूलेंगे और बार-बार याद करेंगे तथा अंत में शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया से उनका मन हट भी जाए तो बहुत आश्चर्य की बात नहीं होगी।
दूसरी तरफ यदि शिक्षक कक्षा में बाल-केंद्रित विधि से शिक्षण कराता है तो निश्चित रूप से बच्चे शिक्षण में आनंदित होकर भागीदारी करेंगे और बच्चों की सृजनात्मक शक्ति को बढ़ाने के साथ-साथ बच्चों का अधिगम भी स्थायी हो जाता है। प्राथमिक स्तर पर बच्चों के अधिगम में संवेदियों का अधिक से अधिक प्रयोग करके अधिगम को आनंदपूर्ण बनाया जा सकता है। पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत की प्रथम अवस्था में संवेदियों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया है।
बच्चों को यदि करके सीखने का अवसर दिया जाए तो बच्चे निश्चित रूप से शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में आनंदित होकर अपनी भूमिका को और बढ़ाने का प्रयास करेंगे। इसी संदर्भ में प्राथमिक स्तर पर बच्चे खेल-खेल में अपनी विषयवस्तु को कंठस्थ करने में सहायक होंगे, जिसमें भ्रमण विधि को एक उदाहरण के रूप में देख सकते हैं। इस विधि के द्वारा बच्चे स्थायी अधिगम करते हैं, जिसको नई शिक्षा नीति के तहत अनुभवजन्य विधि के रूप में रखा गया है, जो बच्चों के अधिगम को आनंदपूर्ण बनाता है।
अगर बच्चों को इस प्रकार से सीखाया जाएगा तो बच्चे अधिगम प्रक्रिया में बढ़-चढ़कर भाग लेंगे और अधिगम को किसी भी तरह का बोझ नहीं समझेंगे। इस प्रकार अधिगम को सरल विधि (भ्रमण विधि) से पूर्ण किया जा सकता है, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बच्चों के अधिगम को सरल व आनंदपूर्ण बनाने में काफी मददगार सिद्ध होगा। प्रस्तुत लेख में प्राथमिक स्तर पर भ्रमण विधि से अधिगम कराने के महत्व का वर्णन किया गया है, जो कि प्राथमिक स्तर के अध्यापकों के लिए सहायक होगा।