खंड 48 No. 3 (2024): प्राथमिक शिक्षक
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बच्चों से बातचीत : एक अनुभव

विजय प्रकाश जैन
प्रधानाध्यापक, राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, मेंदिया डिण्डोर, वीरपुर, बाँसवाड़ा, राजस्थान – 327001

प्रकाशित 2026-07-13

सार

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा—बुनियादी स्तर 2022 शिक्षा को बाल-केंद्रित बनाने पर बल देती हैं। ये दस्तावेज़ बच्चों में रटने की प्रवृत्ति के स्थान पर उनके परिवेश, अनुभवों और सक्रिय सहभागिता को शिक्षा से जोड़ते हुए उनकी रचनात्मक क्षमता, जिज्ञासा तथा चिंतनशीलता के विकास को प्राथमिकता देते हैं।

इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए बच्चों के साथ सार्थक बातचीत और संवाद को बढ़ावा देना अत्यंत आवश्यक है। प्रस्तुत लेख में यह स्पष्ट किया गया है कि शिक्षक बच्चों के साथ चर्चा करते हुए उन्हें अपनी दुनिया, अपने अनुभवों और अपने आसपास के परिवेश के बारे में सोचने, प्रश्न पूछने तथा अपने तर्क विकसित करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

जब बच्चे अपने अनुभवों के आधार पर प्रश्न करते हैं, विचार व्यक्त करते हैं और दूसरों के विचारों पर चर्चा करते हैं, तब वे केवल जानकारी प्राप्त नहीं करते, बल्कि ज्ञान का निर्माण भी करते हैं। इस प्रक्रिया में उनकी भाषा, चिंतन, तर्कशक्ति तथा समस्या-समाधान क्षमताओं का विकास होता है।

यदि बच्चों को उनके परिवेश और अनुभवों से जोड़कर पढ़ाया जाए, तो यह न केवल उनके ज्ञान का विस्तार करता है, बल्कि उनमें समझ विकसित करने, विश्लेषण करने और स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता भी उत्पन्न करता है। इस प्रकार सीखना उनके लिए अधिक अर्थपूर्ण, आनंददायक और स्थायी बन जाता है।

प्रस्तुत लेख इस बात पर बल देता है कि बच्चों की जिज्ञासाओं, अनुभवों और विचारों को शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का आधार बनाया जाना चाहिए। शिक्षक की भूमिका केवल ज्ञान प्रदान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह बच्चों के लिए ऐसा वातावरण तैयार करता है जिसमें वे स्वतंत्र रूप से सोच सकें, प्रश्न कर सकें, अपने विचार व्यक्त कर सकें और नए अर्थों का निर्माण कर सकें।

इस प्रकार, संवाद, चर्चा और अनुभव-आधारित शिक्षण बच्चों के समग्र विकास तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साधन सिद्ध होते हैं।