Published 2026-07-13
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Abstract
शिक्षा व्यक्ति में केवल संज्ञानात्मक विकास ही नहीं करती, बल्कि उसके सामाजिक गुणों का भी विकास करती है। किंतु शिक्षा का आधुनिक स्वरूप मुख्यतः विद्यार्थियों के ज्ञानात्मक तथा क्रियात्मक पक्षों के विकास पर केंद्रित है, जो उनके भावनात्मक पक्षों के प्रभावी विकास में पूर्णतः सक्षम नहीं है। वर्तमान समय में विद्यार्थियों में सामाजिक, सांस्कृतिक तथा नैतिक मूल्यों का विकास अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पा रहा है।
आज के युवा संवेदनहीन होते जा रहे हैं। वे एक-दूसरे की समस्याओं को समझने में कठिनाई अनुभव करते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर एक-दूसरे की सहायता करने की प्रवृत्ति भी अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। ऐसे परिदृश्य में विद्यार्थियों को वैदिक कालीन शिक्षा के विभिन्न मूल्यों एवं सिद्धांतों से परिचित कराना प्रासंगिक प्रतीत होता है।
इसी दृष्टि से नीति-निर्माताओं द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में ऐसे प्रावधान किए गए हैं, जिनका उद्देश्य विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान-परंपरा और मूल्य-आधारित शिक्षा से जोड़ना है। यह नीति इस सिद्धांत पर आधारित है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल साक्षरता, संख्याज्ञान तथा उच्च स्तरीय तार्किक एवं समस्या-समाधान संबंधी संज्ञानात्मक क्षमताओं का विकास करना नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों के नैतिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास को भी सुनिश्चित करना है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इस बात पर बल देती है कि विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास हो, जिससे उनमें मानवीय संवेदनाएँ, नैतिक मूल्य, सामाजिक उत्तरदायित्व, सहयोग, सहिष्णुता तथा मानवीय दृष्टिकोण विकसित हो सकें। इस प्रकार शिक्षा व्यक्ति के व्यक्तित्व के सभी आयामों को विकसित करने का माध्यम बनती है।
प्रस्तुत आलेख में यह जानने का प्रयास किया गया है कि वैदिक कालीन शिक्षा के विभिन्न पक्ष वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के क्रियान्वयन में किस प्रकार उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं तथा वे वर्तमान शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक प्रभावी, मूल्यपरक और जीवनोपयोगी बनाने में किस प्रकार योगदान दे सकते हैं।