खंड 47 No. 4 (2023): प्राथमिक शिक्षक
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शिक्षा में अष्टांगयोग का समावेश : राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के लक्ष्य-प्राप्ति का एक विकल्प

कृष्ण चन्द्र चौधरी
विभागाध्यक्ष, मनोविज्ञान विभाग, सहजानंद ब्रह्मर्षि महाविद्यालय, आरा, भोजपुर, बिहार – 802301

प्रकाशित 2026-07-13

सार

दुनिया को भारतीय ऋषि-मुनियों द्वारा दिया गया एक अनमोल उपहार है— ‘योग’। श्रीमद्भगवद्गीता में योग को परिभाषित करते हुए कहा गया है, “समत्वं योग उच्यते”, अर्थात समभाव ही योग कहलाता है। यानी समता की भावना ही श्रेष्ठ योग है। योग को “योगः कर्मसु कौशलम्” भी कहा गया है, जिससे तात्पर्य यह है कि प्रत्येक कार्य को कुशलतापूर्वक संपन्न करना ही योग है। अतः योग-साधना से आत्मदर्शन होता है।

हमारी पौराणिक और आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार आत्मा का परमात्मा से मिलन ही योग है। प्राचीन ग्रंथों में शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के लिए इसके महत्व का उल्लेख किया गया है। पतंजलि के अनुसार “योगश्चित्तवृत्ति निरोधः” है। महर्षि वेदव्यास के अनुसार “योगः समाधिः” है। फलतः योग शरीर और मस्तिष्क को शांति एवं स्थिरता की स्थिति में लाता है, जिससे अंततः जीवन में जागरूकता का मार्ग प्रशस्त होता है।

वर्तमान में शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों के जीवन में छात्रोपयोगी सदाचार एवं नैतिक मूल्यों के अभाव में अव्यवस्था, कुंठा, हिंसा, अनुशासनहीनता, उपेक्षा, निराशा, असंयम, अशांति आदि दुर्गुण बढ़ते जा रहे हैं। आहार-व्यवहार संबंधी दोष तथा कठिन परिश्रम के प्रति उदासीनता भी निरंतर बढ़ रही है।

विशेषकर सोशल मीडिया और इंटरनेट की लत के कारण अनुपयुक्त साहित्य, संवाद और दृश्यों के दुष्प्रभाव से उत्पन्न संयमहीनता के कारण विद्यार्थियों में इंद्रियों पर नियंत्रण कम होता जा रहा है। परिणामस्वरूप आयु के अनुरूप कर्तव्य एवं नैतिक मर्यादाओं के प्रति जागरूकता में कमी दिखाई देती है। विद्यार्थियों के बीच अवज्ञा, स्वेच्छाचारिता तथा अपराध-बोध से उत्पन्न समस्याएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। इसके फलस्वरूप अशांति, कलह, विद्रोह और हिंसा जैसी प्रवृत्तियाँ भी बढ़ रही हैं।

इस लेख के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया गया है कि वर्तमान शिक्षा, शिक्षक और शिक्षण की यथास्थिति में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 द्वारा निर्धारित सर्वांगीण विकास और कौशल विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने की चुनौतियों से निपटने हेतु ‘शिक्षा में अष्टांग योग का समावेश’ एक प्रभावी विकल्प हो सकता है।

यदि अष्टांग योग का समावेश राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के उद्देश्यों और चुनौतियों के संदर्भ में किया जाए, तो यह शिक्षा, शिक्षण तथा शिक्षक— तीनों के लिए अत्यंत लाभदायक सिद्ध हो सकता है।