प्रकाशित 2026-07-13
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सार
प्राथमिक शिक्षा एक संदर्भ में भाषा शिक्षण है। बच्चे की घर की भाषा और स्कूल की भाषा में जुड़ाव विद्यालयी प्राथमिकता होनी चाहिए। बच्चा अपने अनुभवों को भाषा के माध्यम से संजोकर उन्हें सार्थक बनाता है।
यह प्रक्रिया किसी भाषा के द्वारा ही होती है और यह भाषा बच्चे की घर की भाषा/मातृभाषा ही हो सकती है। अर्थात सर्जना की पहली कोशिश अपनी भाषा में ही आरंभ होती है, क्योंकि जो भावनात्मक और अंतरंग शब्द होते हैं, वे अपनी भाषा से ही उपजते हैं।
प्रत्येक बच्चे में भाषा सीखने की असीम क्षमता होती है और वह अपनी भाषा व उसके व्याकरण को पूर्णतया आत्मसात करने के पश्चात ही स्कूल आता है। विद्यालय पहुँचने से पूर्व बच्चे भाषा के ज़रिए ही दुनिया को महसूस कर रहे होते हैं।
बच्चे भाषा सीखते नहीं, वरन् अपने मस्तिष्क में उसका निर्माण करते हैं। बच्चे समझ बनाने की क्षमता रखते हैं और स्वयं समझ भी बनाते हैं। पाठ्यचर्या और भाषा जब निजी ज़िंदगी से संयोजित होती है, तो वह और समृद्ध होती है।
प्रस्तुत शोध-पत्र बच्चों की भाषाई समझ बनने के पक्षों को गहरे संदर्भों में उजागर करता है तथा यह बताने का प्रयास करता है कि शिक्षकों की भूमिका भाषायी समझ को प्रगाढ़ बनाने में किस प्रकार सहायक हो सकती है।
यह शोध-पत्र बच्चों की भाषायी समझ को और मज़बूत करने की दिशा में कुछ उपायों को सुझाने का संभावित प्रयास भी है।