खंड 49 No. 3 (2026): प्राथमिक शिक्षक
Articles

उदीयमान साक्षरता के संदर्भ में पठन-लेखन संबंध की विश्लेषणात्मक दृष्टि

उषा शर्मा
आचार्य एवं प्रभारी, राष्ट्रीय साक्षरता केंद्र प्रकोष्ठ, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, नई दिल्ली – 110016

प्रकाशित 2026-07-13

सार

भाषा-अर्जन और भाषा-अधिगम की प्रक्रिया भाषा के परिवेश से प्रभावित होती है। भाषायी कौशल भी एक-दूसरे को निरंतर प्रभावित करते हैं। एक अच्छा वक्ता होने के लिए एक अच्छा श्रोता होना अनिवार्य शर्त है, क्योंकि वह ध्यानपूर्वक कही गई बातों और विचारों को सुनकर समझता है और साथ-साथ भाषा भी अर्जित करता है।

सुनना जितना अधिक बेहतर होता है, बोलना उतना ही अधिक समृद्ध होता है। यही संबंध पढ़ना और लिखना में देखा जा सकता है। जब हम पढ़ते हैं तो विचार, विषय के साथ-साथ भाषा भी अर्जित करते हैं।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा बुनियादी स्तर—2022 भी इस ओर संकेत करती है कि प्रिंट और पढ़ने-लिखने के पर्याप्त अवसरों के साथ बच्चे बहुत कम उम्र से पढ़ना, लिखना और सीखना शुरू कर सकते हैं।

पढ़ना और लिखना दोनों भाषा के लिखित रूप से जुड़े हैं। शुरुआती लेखन कौशल में कुछ व्यक्त करने के लिए बच्चे ड्रॉइंग या स्क्रिबलिंग करते हैं और जब उनसे पूछा जाता है कि यह क्या बनाया है, तो वे उसके बारे में बात भी करते हैं।

धीरे-धीरे बच्चे ध्वनि और आकृति के संबंध को समझने लगते हैं और पारंपरिक वर्तनी एवं लेखन की ओर आगे बढ़ने लगते हैं। बच्चे घर और बाहर प्रिंट के संपर्क के माध्यम से शुरुआती पढ़ने और लिखने के कौशल हासिल करते हैं।

पढ़ने और लिखने के संबंध को एक प्रक्रियापरक परिप्रेक्ष्य में देखना अधिक समीचीन है। भाषा के ग्राफोफोनिक (ध्वनि-आकृति), संरचनात्मक, अर्थ संबंधी और प्रयोग के स्तरों पर पढ़ने और लिखने में समानताएँ हैं और दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।

प्रस्तुत लेख पढ़ने-लिखने के परस्पर संबंधों की पड़ताल करता है और कक्षीय प्रक्रिया के आयाम को उद्घाटित करता है।