Published 2026-07-13
How to Cite
Abstract
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 अपने आधार-सिद्धांत के संदर्भ में शिक्षा के लक्ष्य को निर्धारित करते हुए स्पष्टतः उल्लेख करती है कि “शैक्षिक प्रणाली का उद्देश्य अच्छे इंसानों का विकास करना है।” यह लक्ष्य सार्वभौमिक भी हो सकता है और सार्वकालिक भी, क्योंकि प्रत्येक समाज एवं राष्ट्र को स्वयं के विकास के लिए ‘अच्छे इंसानों’ की आवश्यकता होती ही है। चूँकि शिक्षा एक सामूहिक दायित्व के रूप में ‘व्यष्टि से समष्टि’ तक की अनवरत यात्रा करती है, अतः शिक्षा का संस्कार प्राप्त करने में परिवार के सदस्यों के साथ-साथ शिक्षक, विद्यालय, समवयस्क समूह और समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। परंतु फिर भी सीखने का दायित्व मुख्यतः अधिगमकर्ता अर्थात् सीखने वाले पर आता है और विशेष रूप से शिक्षक की भूमिका एक साधनसेवी या सुगमकर्ता के रूप में देखी जाती है।
शिक्षा और समाज के परस्पर संबंध के महत्व को स्वीकार करते हुए कहा जा सकता है कि शिक्षा समाजोपयोगी होती है और देश, काल, वातावरण के अनुसार स्वयं को गढ़ती है। अतः शिक्षा की एक निश्चित परिभाषा और एक निश्चित लक्ष्य निर्धारित करना भी कतिपय जटिल कार्य है, क्योंकि परिवर्तित होते समय और समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा का स्वरूप भी परिवर्तित होता है। शिक्षा और समाज का परस्पर यह ‘सहभाव’ वाला संबंध शिक्षा को नया ‘कलेवर’ प्रदान करता है।
स्वामी विवेकानंद का जीवन-दर्शन और शिक्षा-दर्शन— दोनों ही उनके अनुभूत सत्य और भ्रमणशील प्रवृत्ति से उपजे अनुभव का परिणाम हैं। इस अर्थ में यथार्थपरक क्षेत्र से सिद्धांत और पुनः सिद्धांत से यथार्थपरक क्षेत्र तक की यात्रा में ही शैक्षिक आनंद का भाव निहित है। जीवन के प्रति जो उनका चिंतन रहा है, उसी चिंतनपरक दृष्टि से वे शिक्षा को भी देखते हैं। जीवन का लक्ष्य स्वयं का साक्षात्कार है, तो शिक्षा का भी लक्ष्य इस साक्षात्कार को फलीभूत करना है।
अतः शिक्षा के मूल स्वरूप को समझने के लिए जीवन के मूल स्वरूप को समझना होगा, क्योंकि शिक्षा जीवन से अभिन्न रूप से संबद्ध है। तो प्रश्न उठता है कि अंततः शिक्षा क्या है? वह स्वयं में अनुभव का परिणाम है अथवा अनुभव की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया? यह बिंदु भी चिंतनीय है कि शिक्षा बाह्य तत्व है अथवा आंतरिक तत्व? यदि शिक्षा बाह्य तत्व है, तो क्या वह बाह्य उपादानों पर निर्भर करती है? यदि शिक्षा आंतरिक शक्तियों का बाह्य प्रस्फुटन है, तो उसकी शिक्षा-शास्त्रीय प्रक्रिया क्या होगी?
यह लेख स्वामी विवेकानंद की दृष्टि से शिक्षा-तत्व को समझने, व्याख्यायित करने, विस्तार देने और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की अनुशंसाओं के क्रियान्वयन हेतु मार्ग प्रशस्त करता है। साथ ही, यह लेख शिक्षाशास्त्रीय उपादानों के संबंध में भी चिंतन की उर्वर भूमिका का निर्माण करता है, ताकि यह विचार किया जा सके कि शिक्षा-तत्व की अवधारणा के अनुरूप उसकी शिक्षा-शास्त्रीय प्रक्रिया क्या होगी?