Vol. 48 No. 2 (2024): प्राथमिक शिक्षक
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प्राथमिक स्तर के शिक्षण में अनुभवात्मक विधि द्वारा अधिगम : एक प्रारूप

शरद शर्मा
सहायक आचार्य, राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT), नई दिल्ली – 110024

Published 2026-07-13

How to Cite

शर्मा श. (2026). प्राथमिक स्तर के शिक्षण में अनुभवात्मक विधि द्वारा अधिगम : एक प्रारूप. प्राथमिक शिक्षक, 48(2), p.123-128. https://ejournals.ncert.gov.in/index.php/pp/article/view/5473

Abstract

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने विद्यालयी शिक्षा की संरचना में जो परिवर्तन किए हैं, उनमें प्राथमिक स्तर पर किए गए परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस नई संरचना के अंतर्गत जीवन के प्रथम तीन वर्ष बालवाटिका तथा अगले दो वर्ष कक्षा 1 और 2 के लिए निर्धारित किए गए हैं। इस प्रकार बुनियादी स्तर की शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है।

साथ ही, इस स्तर पर शिक्षकों द्वारा अपनाई जाने वाली रटने-आधारित शिक्षण विधियों के स्थान पर अनुभवात्मक शिक्षण विधियों को प्राथमिकता दी गई है। अनुभवात्मक शिक्षण बच्चों के अधिगम को अधिक रुचिकर, अर्थपूर्ण और प्रभावी बनाने में सहायक सिद्ध होता है।

अनुभवात्मक विधि प्राथमिक स्तर के अधिगम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि यह बच्चों की विकासात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप होती है तथा उनके समग्र सीखने के अनुभवों को समृद्ध बनाती है। इस विधि के माध्यम से संवादात्मक एवं आनंददायक कक्षाओं का निर्माण किया जाता है, जहाँ बच्चों को रचनात्मक, सहयोगात्मक तथा खोजपरक गतिविधियों में भाग लेने के अवसर मिलते हैं।

अनुभवात्मक शिक्षा में बच्चों को प्रश्न पूछने, अपने अनुभव साझा करने, समस्याओं का समाधान खोजने तथा वास्तविक जीवन की परिस्थितियों से सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इससे वे केवल जानकारी प्राप्त नहीं करते, बल्कि ज्ञान का निर्माण स्वयं करते हैं और उसे अपने जीवन से जोड़ पाते हैं।

इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत लेख में अनुभवात्मक विधि द्वारा शिक्षण की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है। साथ ही, इसके प्रभावी क्रियान्वयन से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर भी प्रकाश डाला गया है, जो बुनियादी स्तर के शिक्षकों, शिक्षक-प्रशिक्षकों तथा अन्य हितधारकों के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।

अनुभवात्मक शिक्षण न केवल बच्चों के संज्ञानात्मक विकास को प्रोत्साहित करता है, बल्कि उनके सामाजिक, भावनात्मक, भाषायी तथा रचनात्मक विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है। इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए इस शिक्षण दृष्टिकोण का प्रभावी उपयोग अत्यंत आवश्यक है।