हिंदी सिनेमा में दिव्यांगों की समावेशी शिक्षा की संकल्पना
Published 2026-07-13
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Abstract
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सन 2000 में सहस्राब्दी घोषणा जारी की। अगली महासभा में संघ के तत्कालीन महासचिव कोफी अन्नान ने 2015 तक प्राप्त किए जाने वाले लक्ष्यों की रूपरेखा प्रस्तुत की। 2015 तक दुनिया भर में प्राप्त किए जाने वाले इन 8 लक्ष्यों में दूसरा लक्ष्य था— “सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करना”।
“लक्ष्य 2 का एकमात्र निशाना है, सुनिश्चित करना कि 2015 ई. तक बालक-बालिका सहित सभी बच्चे प्राथमिक शिक्षा का पूर्ण पाठ्यक्रम पूरा करने में समर्थ होंगे।” (MDG 2: Achieve Universal Primary Education)
2017 ई. में जब इन लक्ष्यों की प्राप्ति की रिपोर्ट प्रकाशित की गई तो सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा का लक्ष्य पूरी तरह हासिल करने की कई बाधाओं में एक बाधा दिव्यांगता भी चिह्नित की गई—
“दिव्यांगता— यह शिक्षा हासिल करने में एक अन्य बाधा है। खासकर भारत में, जहाँ 6–13 वर्ष की उम्र के दिव्यांग बच्चों में से 33 प्रतिशत से अधिक स्कूल से बाहर हैं। यह स्थिति शिक्षक प्रशिक्षण, विद्यालय की आधारभूत संरचनाओं के लिए धन का आवंटन तथा शिक्षा का अधिकार अधिनियम जैसे प्रयासों द्वारा शिक्षा को अधिक समावेशी बनाने के बावजूद बनी हुई है।” (MDG 2: Achieve Universal Primary Education)
भारत में समावेशी शिक्षा की संकल्पना के प्रति गंभीर प्रयासों की झलक राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी मिलती है। यह संकल्पना 21वीं सदी में आई हिंदी फिल्मों, जैसे— तारे ज़मीन पर (2007) और हिचकी (2018) में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
इसके साथ ही परिवार, विद्यालय एवं समाज के स्तर पर अनेक चुनौतियाँ भी मौजूद हैं, जो समावेशी शिक्षा के लक्ष्यों की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न करती हैं। दिव्यांगता को शामिल करने वाली प्रभावी फिल्में, जैसे— कोशिश (1972), स्पर्श (1980), ब्लैक (2005), तारे ज़मीन पर (2007) और हिचकी (2018) आदि का सम्यक् विवेचन दिव्यांग विद्यार्थियों के शिक्षण कौशल के विकास में सहायक हो सकता है। उनके संज्ञानात्मक विकास के लिए उचित मार्ग निर्धारित करने तथा शिक्षकों के प्रशिक्षण में भी ये फिल्में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की क्षमता रखती हैं।