Published 2026-07-13
How to Cite
Abstract
किसी भी देश के सभी नागरिकों के सहयोग के बिना उस देश के समग्र विकास की कल्पना नहीं की जा सकती है। भारत जैसे विकासशील देशों में दिव्यांगों की संख्या बहुत अधिक है और इनके समग्र विकास के बिना देश का संपूर्ण विकास संभव नहीं है। अतएव इन दिव्यांगों की औपचारिक विद्यालयी शिक्षा का इतिहास एक बदलते स्वरूप में उभरता हुआ ‘समावेशी शिक्षा’ के रूप में परिलक्षित होता है।
समावेशन से अभिप्राय सभी विद्यार्थियों को बिना किसी बाधा के सामान्य विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करने हेतु अनुमति देने से है। इसके लिए विभिन्न शिक्षण कौशलों को उन कार्यक्रमों में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, जो शिक्षकों को विविधता के बारे में सचेत करने, इसके लिए तैयार होने और उचित शिक्षण विधियों का समर्थन करने के लिए प्रशिक्षित करते हैं।
विकलांग विद्यार्थियों के प्रति पूर्वाग्रह से निपटने और स्थितियों को सकारात्मक रूप से संभालने के लिए उत्कृष्टता, समानता और समता की अवधारणाओं को सम्मिलित किया जाना चाहिए। समावेशी कक्षाओं ने ऐसे शैक्षणिक परिवेश तैयार किए हैं, जिससे विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थियों सहित सभी विद्यार्थी समस्याओं और सीखने के माहौल से लाभ उठाने में सक्षम हों।
प्रस्तुत शोध आलेख में यह विश्लेषण किया गया है कि शिक्षक अपने विद्यार्थियों के मध्य विभिन्न प्रकार के अंतरों पर किस प्रकार प्रतिक्रिया करते हैं। इसके साथ ही, यह भी अध्ययन किया गया है कि शिक्षकों को अपनी कक्षाओं में विविधता का अधिक प्रभावी ढंग से उत्तर देने के लिए किस प्रकार के ज्ञान और समझ की आवश्यकता होती है।
साथ ही यह भी देखने का प्रयास किया गया है कि शिक्षक विद्यार्थियों के मिश्रित समूहों में कार्य करने के लिए स्वयं को बेहतर ढंग से कैसे तैयार कर सकते हैं।
शोधार्थी ने द्वितीयक स्रोतों के आधार पर इन शोध प्रश्नों के उत्तर देने के साथ-साथ, शिक्षक-शिक्षा कार्यक्रमों और उनके प्रत्याशित परिणामों के माध्यम से समावेशी शिक्षक तैयारी हेतु एक प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया है।