प्रकाशित 2026-07-13
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सार
बच्चे अपने घर की भाषा तथा आस-पास के वातावरण की भाषा से अपनी बुनियादी समझ विकसित करते हैं और इसी समझ के साथ वे विद्यालय में आते हैं। जिस भाषा में उनके द्वारा बुनियादी समझ को विकसित किया गया है, यदि वह विद्यालय की भाषा से मेल नहीं खाती तो उनमें आत्मविश्वास की कमी आने लगती है, क्योंकि बच्चे मातृ/स्थानीय भाषा में आसानी से बातों को समझ व विचारों को अभिव्यक्त कर सकते हैं।
प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा प्रदान करना न केवल बच्चों के संज्ञानात्मक, सामाजिक और भावनात्मक विकास को बढ़ावा देता है, बल्कि यह उनकी सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करता है। किसी भी तकनीकी नवाचार, शोध व सामाजिक प्रगति के बारे में सोचना तभी संभव है जब हम अपनी भाषा में सोच और समझ पाएँगे। मौलिक रूप से सोचने में अपनी भाषा सबसे महत्वपूर्ण कारक हो सकती है।
अतः घर की भाषा व विद्यालय की भाषा के मध्य एक सेतु होना चाहिए, जिससे बच्चों के मौलिक विचार संप्रेषित हो सकें। इसके महत्व को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) में मातृभाषा के प्रयोग से विद्यार्थियों को समावेशी एवं प्रभावी शिक्षण-अनुभव प्रदान करने पर जोर दिया गया है।
मातृभाषा बच्चों की सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ उनके संज्ञानात्मक विकास में किस प्रकार अपनी भूमिका का निर्वहन करती है? क्या मातृभाषा शिक्षण माध्यम से बच्चों में सामाजिक समता की भावना का विकास संभव है? एक शिक्षक द्वारा शिक्षण के माध्यम के रूप में मातृभाषा का प्रयोग करने से क्या बच्चों की शैक्षिक उपलब्धि में सुधार किया जा सकता है?
इसके साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि क्या मातृभाषा में शिक्षण से बालक में अस्मिता-बोध को सुदृढ़ किया जा सकता है, जिससे वह अपनी सांस्कृतिक विरासत से न केवल जुड़ा रहे, बल्कि संस्कृति के हस्तांतरण में भी अपनी भूमिका का सजगता से निर्वहन करे।
प्रस्तुत शोध आलेख में शोधकर्ताओं द्वारा उक्त सभी प्रश्नों पर गहनता से विचार किया गया है।