कोरोना/कोविड-19 में मानवीय मूल्यों के ह्रास के कारण एवं निदान में शिक्षक की भूमिका एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
प्रकाशित 2026-07-13
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सार
मनुष्य में काम, क्रोध, मोह, लोभ, माया, तृष्णा, घृणा, प्रेम, भक्ति, धैर्य, विवेक, आनंद, शोक, मद, ईर्ष्या, निंदा, असूया, आत्म नियंत्रण, अनुशासन, निष्ठा, क्षमा, सहानुभूति, दृढ़ता, स्थिरता, निर्भरता, करुणा आदि अनेकों तत्वों का समावेश होता है। इन्हीं सब गुणों के कारण मनुष्य को किसी भी अन्य जीव-जंतु से श्रेष्ठ माना गया है। मानवीय मूल्यों का किसी भी व्यक्ति के लिए अत्यधिक महत्व होता है और ऐसा इसलिए, क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने व्यवहार स्वभाव के द्वारा समाज में रहने वाले समग्र व्यवहार का निर्धारण करता है। मनुष्य पृथ्वी पर रहने वाले अन्य प्राणियों के समान ही इस पृथ्वी का एक सदस्य है जो कि अनंत काल से अन्य जीव-जंतुओं के साथ सामंजस्य बनाकर रहता आ रहा है। मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणी मात्र अपने शरीर तक ही सीमित रहते हैं अर्थात उनके लिए शरीर की सीमा का अतिक्रमण करना संभव नहीं होता, लेकिन मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो केवल चेतन जीवित सत्ता ही नहीं है, बल्कि एक आत्म चेतन सत्ता भी है। मनुष्य की चेतना न केवल बहिर्गामी, बल्कि वह अंतर्मुखी भी है। कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में जो निर्णय लेता है वे केवल एक व्यक्ति विशेष को ही प्रभावित नहीं करते, बल्कि हमारे परिवार, संगठन, समाज के साथ-साथ हमारे राष्ट्र को भी प्रभावित करते हैं। जिस प्रकार आज के समय में मानवीय मूल्यों में दिन-प्रतिदिन कमी होती जा रही है और उन कमियों के कारकों के ऊपर क्रमबद्ध तरीके से मानवीय मूल्यों की कमियों को दूर करके उनमें सुधार किया जा सकता है और ये सुधार एक शिक्षक के माध्यम से किसी भी मनुष्य के संपूर्ण विकास में योगदान दे सकते हैं। प्रस्तुत लेख में मानवीय मूल्यों के ह्रास के कारणों का समाज पर पड़ने वाले प्रभाव और उनके निदान का अध्ययन किया गया है। समाज में फैली विकृतियों को मानवीय मूल्यों, आदर्शों व संवेदनशीलता से जोड़ना होगा। संवेदनशील व उदार शिक्षक वर्तमान परिदृश्य को बदलने में सक्षम होते हैं। शिक्षा के माध्यम से समाज में सेवा, समर्पण, सामंजस्य, समन्वय, सद्भाव व त्याग की भावनाएँ विकसित होनी चाहिए। शिक्षा को सुदृढ़ बनाने में शिक्षकों की सक्रिय भागीदारी व सद्भावना महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।