प्रकाशित 2026-07-13
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सार
वर्तमान समय में कोरोना महामारी ने जिस तरह से हमारे सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक वातावरण को प्रभावित किया है, कहीं न कहीं यह महामारी मानव जीवन के लक्ष्य एवं आवश्यकताओं को पुनर्संरचित एवं पुनर्स्थापित करने की ओर इशारा करती है। इसके साथ ही, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन, जनसंख्या वृद्धि, पर्यावरण प्रदूषण, मानवीय एवं नैतिक मूल्य में गिरावट, हमारे शैक्षिक उद्देश्यों, शैक्षिक पाठ्यक्रम एवं शिक्षा-प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन की नितांत आवश्यकता को दर्शाती है। मौजूदा समय में जिस तरह से शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाने एवं भौतिक संसाधनों की प्राप्ति का जरिया बन कर रह गया है, ऐसी परिस्थिति में शिक्षा मानव के सर्वांगीण विकास में सहायक न होकर अवरोधक ही बन रही है। अतः यह अत्यंत आवश्यक है कि प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों, गतिविधियों एवं अध्यापन शैलियों में परिवर्तन किया जाए। शिक्षा को विज्ञान और तकनीकी के साथ-साथ आध्यात्मिक और नैतिक विकास की प्रक्रिया में भी एक मजबूत सहायक प्रणाली के रूप में उभरकर सामने आना होगा; क्योंकि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य विज्ञान, तकनीकी, आर्थिक एवं प्रौद्योगिकी विकास के साथ-साथ मानवीय आचरण में नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों का समावेशन करना भी है। इसी क्रम में, भारत के पूर्व-राष्ट्रपति अब्दुल कलाम द्वारा लिखित पुस्तक ‘तेजस्वी मन’ हमारी वर्तमान शिक्षा-नीतियों, पाठ्यचर्या, विद्यालयी-पाठ्यक्रम के साथ-साथ प्रधानाध्यापकों, अध्यापकों, माता-पिता, अभिभावकों के लिए मार्ग-प्रशस्त करती है कि बालक-बालिकाओं में विज्ञान व तकनीकी ज्ञान के साथ ही चारित्रिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान का विकास किस प्रकार किया जाए? यह पुस्तक विद्यार्थियों में प्रारंभिक स्तर से ही देश-प्रेम, देश-रक्षा, भारतीय संस्कृति एवं नैतिक मूल्यों, जैसे— सत्य, त्याग, समर्पण, कर्तव्यनिष्ठता, ईमानदारी, समानता, एकता को अपने व्यवहार में समावेशित करने पर बल देती है। अतः यह पुस्तक प्राथमिक शिक्षकों के साथ-साथ नीति निर्माताओं, विद्यालय प्रशासकों, एवं शिक्षक-प्रशिक्षकों को प्राथमिक शिक्षा में विज्ञान और नैतिकता के समावेशन की परिपाटी बनने के लिए प्रेरित एवं मार्गदर्शित करती है।