खंड 48 No. 2 (2024): प्राथमिक शिक्षक
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कक्षा में बातचीत का शिक्षणशास्त्रीय महत्व

दिनेश कुमार गुप्ता
प्रवक्ता, अग्रवाल महिला शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, गंगापुर सिटी, राजस्थान – 322201

प्रकाशित 2026-07-13

सार

आमतौर पर कक्षाओं में बच्चों को बातचीत करने की अनुमति नहीं होती। बातचीत को प्रायः शोर समझा जाता है और कक्षा में इसे मुख्यतः अनुशासनहीनता का प्रतीक माना जाता है। परिणामस्वरूप बच्चों की इस स्वाभाविक प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करने के बजाय उन्हें बार-बार चुप रहने के लिए कहा जाता है।

अनुभव-आधारित यह लेख भाषा सीखने में बातचीत की महत्ता को रेखांकित करता है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि बच्चों के साथ बातचीत करना क्यों आवश्यक है, कक्षा में किन-किन अवसरों पर तथा किन-किन माध्यमों से बातचीत की शुरुआत की जा सकती है और किस प्रकार की बातचीत बच्चों के भाषा-विकास में सहायक हो सकती है।

जब बच्चों को बातचीत के अवसर मिलते हैं, तो वे अपने तर्क प्रस्तुत करते हैं, स्वयं अपने विचारों और कथनों का विश्लेषण करते हैं तथा किसी विषय के पक्ष और विपक्ष में अपने विचार व्यक्त करते हैं। इससे उनमें तर्क करने, विश्लेषण करने, सोचने-समझने तथा अभिव्यक्ति की क्षमताओं का विकास होता है। बातचीत बच्चों को सीखने के नए आयामों से परिचित कराती है और उनकी भाषायी दक्षताओं को समृद्ध बनाती है।

अतः आवश्यक है कि कक्षा में बातचीत को एक महत्त्वपूर्ण शिक्षणशास्त्रीय उपागम के रूप में स्वीकार किया जाए तथा उसे शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए। इसकी शुरुआत सरल प्रश्नों से भी की जा सकती है, जैसे— विद्यालय आते समय रास्ते में क्या देखा? सुबह घर पर क्या-क्या हुआ? आज का दिन अब तक कैसा रहा? आदि।

इस प्रकार की गतिविधियाँ कक्षा में बच्चों के लिए एक अनुकूल और सहभागितापूर्ण वातावरण तैयार करती हैं तथा यह सुनिश्चित करती हैं कि सभी बच्चों को अपनी बात कहने और दूसरों की बात सुनने का अवसर प्राप्त हो। परिणामस्वरूप कक्षा अधिक जीवंत, संवादपरक और अधिगम-केंद्रित बनती है।