खंड 48 No. 1 (2024): प्रा‍थमिक शिक्षक
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विद्यालयी शिक्षा को प्रभावी बनाने के लिए कला समेकित शिक्षा

पुष्पेंद्र यादव
पीएच.डी. शोधार्थी, शिक्षा विभाग (केंद्रीय शिक्षा संस्थान), दिल्ली विश्वविद्यालय, 33, छात्र मार्ग, दिल्ली – 110007

प्रकाशित 2026-07-13

सार

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने अपने दस्तावेज़ में स्पष्ट किया है कि प्रारंभिक स्तर पर भारत में लगभग पाँच करोड़ विद्यार्थी ऐसे हैं, जो बुनियादी साक्षरता और संख्याज्ञान के कौशलों को अर्जित करने में कठिनाई महसूस करते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने ऐसे बच्चों के लिए विशेष कदम उठाने तथा वर्ष 2025 तक उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की मुख्यधारा में शामिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

असर (ASER) 2021 तथा राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (NAS) 2021 के दस्तावेज़ों का अवलोकन करने से स्पष्ट होता है कि प्रारंभिक स्तर पर विद्यार्थी गणित, अंग्रेज़ी तथा अन्य विद्यालयी विषयों के लिए निर्धारित अधिगम प्रतिफलों को प्राप्त करने में कठिनाई का अनुभव कर रहे हैं।

भारत उन देशों की सूची में शामिल है, जिन्हें सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के अंतर्गत वर्ष 2030 तक गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक शिक्षा को सार्वभौमिक रूप से उपलब्ध कराना है। ऐसे में परंपरागत शिक्षण-अधिगम विधियों के साथ कला-समेकित शिक्षा का प्रभावी समावेशन शिक्षकों और विद्यार्थियों दोनों के लिए अत्यंत सहायक सिद्ध हो सकता है।

शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में कला— जैसे नृत्य, नाटक, संगीत, चित्रकला, मिट्टी के बर्तन बनाना, कागज़ शिल्प, मुखौटा निर्माण तथा कठपुतली आदि— के समावेशन से विद्यार्थी मनोरंजक एवं सहभागी वातावरण में, सामूहिक रूप से तथा स्वयं करके नई अवधारणाओं को सीखते हैं। साथ ही शिक्षक विद्यार्थियों में सहयोग, रचनात्मकता, अभिव्यक्ति, उच्च प्रतिधारण क्षमता तथा समस्या-समाधान जैसे महत्वपूर्ण कौशलों का विकास कर सकते हैं।

इस आलेख में लेखक ने विभिन्न संभावित उदाहरणों एवं गतिविधियों के माध्यम से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि कला-समेकित शिक्षा प्रारंभिक स्तर के विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के लिए किस प्रकार उपयोगी सिद्ध हो सकती है तथा शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को किस प्रकार सकारात्मक रूप से संवर्धित कर सकती है।