प्रकाशित 2026-07-13
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सार
ग्रामीण अंचल के सुदूरवर्ती क्षेत्र के अधिकांश बच्चे, जो विद्यालयों में नामांकित हैं, भाषा की कठिनाइयों के कारण प्रभावी ढंग से शिक्षण-अधिगम में अभिरुचि नहीं ले पा रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में उनके अभिभावक, जो शिक्षण के दायरे में नई भाषा से अनभिज्ञ होते हैं, वे अपनी मातृभाषा के आधार पर शिक्षण-अधिगम हेतु बच्चों के लिए संघर्ष करते हैं।
भाषागत समस्या विद्यालयों में बच्चों का शैक्षणिक प्रदर्शन कमजोर करती है। जिस वजह से कुछ वर्षों के पश्चात बच्चों के विद्यालय छोड़ने का जोखिम बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आयोजित ‘राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण 2021’ और ‘फाउंडेशनल लर्निंग स्टडी 2022’ से यह ज्ञात होता है कि आदिवासी समुदायों के बच्चे अन्य समुदायों के बच्चों की तुलना में शिक्षा-अधिगम में अच्छा प्रदर्शन नहीं करते हैं। क्योंकि इन बच्चों की मातृभाषा विद्यालयी शिक्षण-अधिगम की भाषा से पूर्णतः भिन्न होती है।
अतः उपयुक्त परिप्रेक्ष्य में साक्षरता दर का अभीष्ट आँकड़ा प्राप्त करने हेतु और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं सभी के लिए आजीवन सीखने हेतु सतत विकास लक्ष्य के ‘चौथे लक्ष्य’ को प्राप्त करने के लिए बहुभाषा में प्राथमिक शिक्षा की महत्वपूर्ण आवश्यकता प्रतीत होती है।
आलेख के माध्यम से राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और विद्यालयी शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2023 में ‘बहुभाषिकता’ के महत्व को समझने एवं परखने के साथ-साथ इसकी व्याख्या व विश्लेषण के माध्यम से नए तथ्यों व पक्षों को प्रस्तुत करने का प्रयास है।