खंड 49 No. 1 (2025): प्राथमिक शिक्षक
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प्रारंभिक स्तर पर बच्चो में समानुभूति का विकास

सबा यासमीन
पी-एच.डी. शोधकर्ता, डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशनल स्टडीज, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली – 110025
हरप्रीत कौर जस
एसोसिएट प्रोफेसर, डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशनल स्टडीज, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली – 110025

प्रकाशित 2026-07-13

सार

मनोवैज्ञानिक विकास के लिए सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विचारों को फिर से समझना आज के समय में बहुत जरूरी है। कल्पनाओं को विकसित करने के लिए मौजूदा शैक्षणिक सिद्धांतों के अतिरिक्त वैकल्पिक विचारों पर भी विचार करना अत्यंत आवश्यक है। संतों के मनो-आध्यात्मिक विचार मनुष्य के अस्तित्व की जटिलताओं को हल करते हैं। कई मानवीय गुणों में से एक गुण है समानुभूति, जो सामाजिक व्यवहार के लिए बहुत जरूरी है। जहाँ वर्तमान समय संघर्षों और टकरावों से भरा हुआ है, वहाँ समानुभूति की आवश्यकता और भी अधिक हो जाती है। ऐसे में सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विचारों का उल्लेख करना कभी अप्रासंगिक नहीं होता।

कबीर की आत्म-आलोचनात्मक दृष्टि और गुरु नानक के भक्ति मार्ग के विचार इस संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण हैं। गुरु नानक ने समानता, सेवा और समुदाय को प्राथमिकता दी और समानुभूति तथा सामाजिक समरसता का मार्ग प्रशस्त किया, वहीं कबीर ने आत्म-अवलोकन और आत्म-आलोचना को व्यक्तिगत सुधार और नैतिक विकास का आधार माना।

इन विचारों से बच्चों में समानुभूति, आत्म-स्वीकृति और सहयोग की भावना विकसित की जा सकती है। साथ ही ऐसे विचार हमारे आस-पास के प्राकृतिक परिवेश और भौतिक वस्तुओं के प्रति संवेदनशीलता एवं सहिष्णुता के भाव को भी बढ़ावा देते हैं।

इस लेख में बताया गया है कि समानुभूति के माध्यम से बच्चों में भावनात्मक बुद्धिमत्ता, सहयोग और नैतिक जिम्मेदारी का विकास किया जा सकता है, जो उन्हें न केवल सजग एवं स्फूर्तिपरक बच्चों के रूप में विकसित करता है, बल्कि पूर्ण व्यक्तित्व और संवेदनशील नागरिक के रूप में भी विकसित करता है।