Vol. 45 No. 1 -2 (2024): भारतीय आधुनिक शिक्षा
Articles

दक्षिण भारत में क्षेत्रीय भाषाओं का संरक्षण : शैक्षिक दृष्टिकोण और रणनीतियाँ

सुरेश कुमार मिश्रा
संसाधन व्यक्ति (हिंदी), पाठशाला शिक्षा विभाग, तेलंगाना सरकार, हैदराबाद – 500076

Published 2026-07-14

How to Cite

मिश्रा स. क. (2026). दक्षिण भारत में क्षेत्रीय भाषाओं का संरक्षण : शैक्षिक दृष्टिकोण और रणनीतियाँ. भारतीय आधुनिक शिक्षा, 45(1 -2), p.22-30. https://doi.org/10.64742/pn1fbw22

Share

Abstract

दक्षिण भारत की चार प्रमुख भाषाएँ — तमिल भाषा, तेलुगु भाषा, कन्नड़ भाषा और मलयालम भाषा — अपने साहित्यिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व के कारण भारतीय उपमहाद्वीप की अमूल्य धरोहर हैं। वर्तमान समय में शिक्षा और नीति-निर्माण के माध्यम से इन भाषाओं का संरक्षण सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि ये भाषाएँ आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रह सकें।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में प्रदान करने पर विशेष बल दिया गया है, जिससे बच्चों में अपनी भाषा के प्रति समझ और आत्मीयता विकसित हो सके। इसके अतिरिक्त राज्य सरकारें स्थानीय भाषाओं में पाठ्यक्रमों के विकास, डिजिटल शिक्षण सामग्री के निर्माण तथा द्विभाषीय शिक्षा प्रणाली के माध्यम से भाषा संरक्षण को बढ़ावा देने का कार्य कर रही हैं।

कर्नाटक, आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु जैसे राज्यों में क्षेत्रीय भाषाओं में डिजिटल सामग्री के विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि युवा पीढ़ी प्रौद्योगिकी के माध्यम से अपनी मातृभाषा से जुड़ी रह सके। इसके अतिरिक्त विद्यालयों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा स्थानीय साहित्य की पुस्तकों को पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने के प्रयास भी जारी हैं, जिससे विद्यार्थियों में अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति सम्मान एवं गर्व की भावना विकसित हो।

ये प्रयास केवल शैक्षिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का माध्यम भी बन रहे हैं, जो एक सकारात्मक और समृद्ध भविष्य की ओर संकेत करते हैं।